रविवार, 23 जुलाई 2017

रिमाइंडर-लघुकथा

रिमाइंडर
" मनीषा, एल आई सी की किश्त भरने का समय निकल गया। अब फाइन देना होगा। रिमाइंडर तो लगा दिया होता।"
मनीषा चाय बनाते बनाते रुक गई। उसने अमित की ओर देखा और एक फीकी हँसी हँस दी।
अमित को सहसा याद आ गया वह पार्टी वाला दिन जब उसने अपने दोस्तों से परिचय करवाते हुए कहा था" ये हैं हमारी श्रीमती जी जो सारे काम रिमाइंडर से ही करती है। साल बदलते ही सभी खास मौकों के लिए रिमाइंडर सेट कर देती हैं। मुझे लगता है आगे रिमाइंडर पर यह भी लगा देंगी की मैं ही इनका पति हूँ।"
और दोस्तों के ठहाको के बीच किसी ने उस अपमान की रेखा को नहीं देखा जो मनीषा के चेहरे पर उभरी थी।
अमित ने आज अचानक महसूस किया और स्वयं मोबाइल लेकर मनीषा के सामने खड़ा हो गया।
-ऋता

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

ताटंक छंद



ताटंक छंद

1 लावणी
मोहन के माथे केशों की, अवली बड़ी निराली है|
हौले हौले खेल खेल कर, पवन हुई मतवाली है|
थिरक रही अधरों पर बंसी,तन्मय झूम रही गइया|
मोहिनी छवि नंदलाला की, निरखतीं यशोमति मइया||


2 लावणी
रचकर लाली हाथों में तुम, ज़ुल्फ़ें यूँ बिखराती हो|
बादल की बूँदों से छनकर, इंद्रधनुष बन जाती हो|
चमका सूरज बिंदी बनकर, संगीत सुनाये कँगना|
करता जगमग तुलसी चौरा, तुम से ही चहके अँगना||

3 ताटंक
सीमा पर वह डटे हुए हैं, भारत की रखवाली में|
स्वर्ण बाल हैं भुट्टों के भी, कृषकों की हरियाली में|
सोच रहे जब देश के लिए, निज कर्तव्य निभा लेना|
लोक हितों की खातिर साथी, मन का स्वार्थ हटा देना||
--ऋता शेखर 'मधु'

ताटंक-16-14 पर यति...अन्त में गुरु गुरु गुरु

लावणी-16-14 पर यति... लघु लघु गुरु

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

आदर्श घर

आदर्श घर

डॉक्टर बन चुकी निकिता भाई की शादी में आई थी . उसका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ बेटा-बेटी का कोई भेदभाव न था| अच्छे संस्कारों के साथ बड़ी हुई थी .

सबने उसे सर-माथे पे बिठाया | वह भी पूरे घर में चहकी फिर रही थी| माँ कुलदेवता की पूजा में व्यस्त थी और निकिता कहती जा रही थी-

'माँ , हमारा घर कितना आदर्श है न! बेटा- बेटी में फर्क नहीं करता|'

पूजा के बाद प्रसाद बँटने लगा तो दादी की आवाज आई|

"बहू, सबसे किनारे वाले देवता का प्रसाद निक्की को न देना|"

"क्यों दादी" निकिता की आवाज में हल्की सी नाराजगी थी|

"निक्की बेटा, वो प्रसाद सिर्फ खानदान के बच्चे ही खा सकते हैं| वह तेरा भाई ही खा सकता है|"

अचंभित सी निकिता ने अपना बढ़ा हुआ हाथ पीछे खींच लिया|


--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 19 जुलाई 2017

दोहे की दुनिया

दोहे

1
बहन रेशमी डोर को, खुद देना आकार |
चीनी राखी त्याग कर, पूर्ण करो त्योहार||
2
महकी जूही की कली, देखन को शुभ भोर
खग मनुष्य पादप सभी, किलक रहे चहुँ ओर
3
मन के भीतर आग है, ऊपर दिखता बर्फ़।
अपने अपनों के लिए, तरल हुए हैं हर्फ़।।
4
ज्ञान, दान, मुस्कान धन, दिल को रखे करीब।
भौतिक धन ज्यों ज्यों बढ़े, होने लगे गरीब।।
5
जब जब भी उठने लगा, तुझपर से विश्वास|
दूर कहीं लहरा गई, दीप किरण सी आस||
6
इधर उधर क्या ढूँढता, सब तेरे ही पास|
नारिकेल के बीच है, मीठी मीठी आस||
7
अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
8
बिन काँटों के ना मिले, खुश्बूदार गुलाब|
सब कुछ दामन में लिए, बनो तुम आफ़ताब||
9
पावन श्रावण मास की, महिमा अपरम्पार।
बूँद बूँद है शिवमयी, भीगा है संसार।।.
10
जब जब पढ़ते लिस्ट में, लम्बी चौड़ी माँग|
नीलकंठ भगवान को,तब भाते हैं भाँग||
11
फूल खिलें सद्भाव के, खुश्बू मिले अपार।
कटुक वचन है दलदली, रिश्तों को दे मार।।

--ऋता